गांधीजी के असहयोग आंदोलन ने भारत की आज़ादी में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

गांधीजी

मुकेश पाण्डेय | NavprabhatTimes.com

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पूरा जीवन संघर्षपूर्ण व सम्पूर्ण जनमानस के लिए एक आदर्श बन गया। उनके द्वारा छेड़ी गई आज़ादी की अहिंसात्मक लड़ाई के समक्ष अंततः अंग्रेजी सरकार को घुटने टेकने पड़े। असहयोग आंदोलन इस अहिंसात्मक लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

असहयोग आंदोलन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ गांधीजी द्वारा शुरू किया गया था। उस समय देश की अर्थव्यवस्था ब्रिटिश सरकार के अधीन थी। इस आंदोलन के कारण उस समय ब्रिटिश सरकार को बहुत नुकसान हुआ था। असहयोग आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की कमर तोड़ कर रख दी।

वर्तमान समय में कई लोग गांधीजी के नाम पर सामाजिक या राजनीतिक अव्यवस्था के खिलाफ इस प्रकार के आंदोलन को शुरू करते हैं। पर अधिकतर लोग लोककल्याण के नाम पर प्रचार पाने के लिए ऐसा करते हैं। युद्ध में कमांडर के लिए हमले और किसी कंपनी के लिए मजदूरों के हड़ताल बहुत हानिकारक हैं।

प्रजातंत्र में सरकार के विपक्ष की पार्टी के लोग ऐसे क्षण का समर्थन करते हैं, क्योंकि वे सरकार के विरूद्ध विचारों से प्रेरित होते हैं। ऐसे विरोधी विचारों से प्रेरित होकर लोग हड़ताल पर जाते हैं या किसी भी संभव तरीके से सरकार को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं और इस तरह की गतिविधियों की वजह से देश की आर्थिक स्थिति पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

ऐसे आंदोलनों के कारण देश के सकल घरेलू उत्पाद पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जीडीपी में गिरावट मुद्रास्फीति की वृद्धि के कारण हो जाता है; और फिर क्या? स्वार्थी लोग इन्फलेशन के खिलाफ एक और आंदोलन शुरू करेंगे और फिर जीडीपी पर आएंगे और चक्र जारी रहेगा। इन सबके बीच अंत में आम आदमी का ही नुकसान होता है।

अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल बिल के आंदोलन का उदाहरण ले सकते हैं। जब वे अनशन पर गए, सैकड़ों लोगों ने उनका समर्थन किया। लाखों लोग अपनी रोजी रोटी छोड़ कर आंदोलन में शामिल हुए। इस कारण देश को करोड़ों का नुकसान हुआ। देश की आर्थिक स्थिति में गिरावट आई। लोकपाल बिल तो आया ही नहीं, पर देश आर्थिक रूप से कुछ दिनों के लिए पिछड़ गया। ऊपर से महंगाई बढ़ने के कारण लोगो की तकलीफ़ और बढ़ गई।

क्या हम आज भी गुलामी के जमाने में जी रहे हैं? हमें यह समझने की जरूरत है कि अब अंग्रेजों का राज नहीं है। देश भी हमारा है और सरकार भी हमारी है। क्यों न हम सब साथ मिल कर ईमानदारी से अपना काम करें! क्योंकि अगर आज गांधीजी जिंदा होते तो यह सब देख कर कहते ‘ देश तो अपना हो गया, लेकिन अपने पराये हो गए।

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