बापू! (कविता) – हूबनाथ पाण्डेय

बापू
    • हूबनाथ पाण्डेय  

मैं जब तक राजघाट पहुँचू
आप निकल चुके थे
बा और चारों बच्चों को लिए

पैदल ही पोरबंदर चल दिए
बेरोज़गार मज़दूरों के साथ

बाद में पता चला कि
पुणे के पास कहीं
थककर बा ने दम तोड़ दिए

उसी समय अख़बार में पढ़ा
कि कुछ लोगों ने आपको
फिर से गोली मार दी

बाद में पता चला कि
वह तो आपका पुतला था
आप तो अपने बेटों के साथ
कोविड सेंटर में
मरीज़ों की सेवा कर रहे थे

मैं वहाँ भी आया
तब तक आप काशी में
मुर्दों के अंतिम संस्कार में
व्यस्त हो गए

इस बुढ़ापे में एक जगह
स्थिर होकर बैठना था
तो जाकर बैठ गए
किसानों के साथ
राजधानी की सीमा पर

कड़कड़ाती ठंड में
जिस दिन मैं पहुँचा
सिंघु बॉर्डर पर
आपकी चिता जल रही थी
फिर से राजघाट पर

कुछ हताश निराश
सिर झुकाए सिसक रहे
तो कई अलाव की तरह
ताप रहे चिता आपकी

पर मैं जानता हूँ
कल पकड़े जाओगे
नक्सलियों के बीच
जल ज़मीन जंगल के लिए

किसी अदालत में चलेगा
मुक़दमा राजद्रोह का
और क़ैद कर दिए जाओगे
सरकारी दीवारों पर टँगी
मुस्कुराती तस्वीरों में

नज़रबंद किए जाओगे
संग्रहालयों ग्रंथालयों में
सेमिनारों गोष्ठियों में
देश के दुर्भाग्य का ठीकरा
आपके ही सिर फूटेगा

बहुत रूप बदलते हो ना!
अब पूरी ज़िंदगी तड़पोगे
मोटी मोटी पोथियों में
घुन लगी व्यवस्था में
खा जाएँगे निर्लज्ज दीमक

तब फिर एक बार
मैं आऊँगा आपसे मिलने
उसी राजघाट पर
जहाँ हर साल जलती है
चिता आपकी।

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