शीला वर्मा की चार कविताएँ

शीला वर्मा
प्रतीकात्मक चित्र

एक ..

माँ तुम मेरी ही रही
फ़िर भी मुझसे दूर रही
तुम्हारे होने का अहसास है
जो सदा मेरे साथ है
जब चाहा तुमसे
गले लग कर हँसना
और कभी दुःख में रोना
तब भी तुम्हारी
तसल्ली ही मिली
परिस्थितियां सदा
विषम रहीं
लेकिन माँ
प्यार तुम्हारा
सम ही रहा
दिल में एक टीस सी थी
अपने ही दुःख में
मैं डूबी जो थी
फ़िर मुस्काने की
वज़ह मिली
एक नन्ही सी
कली खिली
माँ कहकर उसने
मुझे पुकारा
सच कहूँ माँ
अपनी ही बेटी में
तुमको पाया
हँसना , रोना
रूठना , मनाना
जो न कर पाई
साथ तुम्हारे
सारी इच्छाएँ
जीवित हो उठीं
फ़िर एक बार
माँ तुम्हारे होने का अहसास।

दो ..

सुबह बाँझ नही होती
वह तो जीवन देती है
आज कमी तुम में ही थी
रात के अँधेरे में आए विचार
सुबह तक आज जागे ही नहीं
लेकिन तुम्हें क्या
फ़र्क जो नहीं पड़ता
किसी भी बात का
किसी भी अहसास का
कठोरता तुम में है
कविता को आज उठने
का मौका ही नहीं दिया
अलसाई पड़ी है वह
हृदय के किसी कोने में
हिकारत से तो तुम कहते हो
कि कोई फ़र्क नहीं पड़ता
सुबह तो तुम्हारी
राह देखती है
तुम्हारी प्यारी सोच को
कविता में पिरोती है
सुबह बाँझ नहीं होती
वह तो जीवन देती है
सिर्फ़ जीवन
एक नया जीवन।

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तीन …

आदमी बीमार होता है
शरीर से भी
और मन से भी
शरीर की बीमारी
ठीक होती है
दवाई से
मन की बीमारी
असाध्य है
वह बीमार करती है
उन सभी को
जो जुड़े हैं
उस मन से
और बीमार मन
नहीं समझ पाता है
किसी भी स्वस्थ मन के
स्नेह और अपनेपन को
रोकना होगा
इस बीमारी को
तभी तो जी पाएगा
एक मन
शायद एक जीवन।

चार ….

मेरे प्रेम को अपनी जीत
और मेरी कमज़ोरी
समझने की भूल न करना
मन तो तुम्हारा चंचल है
जो अधीर और बेचैन है
मेरे प्रेम में निष्ठुरता भी है
और कोमलता भी है
न तुमसे कोई चाह है
न ही कोई शिक़वा
स्वार्थ से परे
मेरे निष्ठुर प्रेम को
तुम अपनाओ या
छोड़ दो मरुस्थल में
जीवन की कठोरता में
एक असह्य वेदना के साथ
नहीं करूँगी
कोई शिकायत
तुमसे कभी
तुम नहीं थे मेरे कभी
वह तो प्रेम था
जो सिर्फ़ मेरा था।

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कवयित्री का परिचय


 

शीला वर्मा
शीला वर्मा

शीला वर्मा

  • एम. फिल. यूजीसी नेट
  • पी.एच.डी. शोधछात्रा
    मुंबई विद्यापीठ, मुंबई

 

 


 

1 COMMENT

  1. बहुत ही बेहतरीन कविता ।।।।।मेरे दिल की हर बात ।।।जैसे आपने कह दी।।।

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