आंखें नम कर देगी ‘पीहू’ ( मायरा विश्वकर्मा ), एक छोटी सी बच्‍ची की एक्‍ट‍िंग काबिल-ए-तारीफ

मुंबई: बॉलीवुड में एक छोटे से कमरे के अंदर ऐसी बहुत ही कम फिल्में बनती हैं जो दर्शकों के दिलों-दिमाग पर छाप छोड़ती हैं। साल 2016 में निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने की फिल्म ट्रैप्ड के बाद पत्रकार से डायरेक्टर बने विनोद कापड़ी की फिल्म पीहू भी दर्शकों के दिलों-दिमाग पर ऐसी ही छाप छोड़ सकती है। इससे भी ज्यादा खास बात यह है कि 2 साल की बच्ची (मायरा विश्वकर्मा) से कैमरे पर अभिनय कराना। यह फिल्म मुंबई में कल रिलीज़ हो रही है।

पीहू फ‍िल्‍म की शुरुआत होती है 2-3 साल की एक छोटी सी बच्ची ( मायरा विश्वकर्मा ) के साथ जो खुद को एक फ्रिज में बंद कर लेती है। घर में पीहू की मां है जो बेहोश है। ये बच्ची पूरे घर में अकेले घूम रही है जिसे देखने वाला कोई नहीं है। दो साल की बच्ची के इर्दगिर्द घूमती फ‍िल्‍म पीहू 16 नवंबर को र‍िलीज होने वाली है। विनोद कापड़ी द्वारा न‍िर्देश‍ित इस फ‍िल्म की कहानी काफी शानदार है और उससे भी लाजवाब है छोटी सी बच्‍ची की एक्‍ट‍िंग।

आपकी बेचैनी और बढ़ जायेगी जब आप देखेंगे कि एक ऊंची बिल्डिंग की बालकनी खुली है और उस में कोई फ़ेन्सिंग तक नहीं है। घर में कुछ इलेक्ट्रानिक सामान भी है, जो किसी भी वक्त खराब हो सकते हैं। ये परिस्थितियां इतनी गंभीर है जो दर्शकों की बेचैनी को बनाये रखती है।

पीहू

बड़े से घर में अकेले बंद पीहू पहले तो खुद को फ्रिज में बंद कर लेती है, फिर बाद में कभी गीज़र तो कभी दूसरे इलेक्ट्रॉनिक आइटम ऑन कर देती है। पीहू अपने लिए खाना भी बनाने की कोशिश करती है, पहले माइक्रोवेव पर और फिर गैस बर्नर पर। गिरते पड़ते हुए पीहू बाल बाल बचती है जब उसकी गुड़िया उसके अपार्टमेंट की बिल्डिंग से नीचे गिर जाती है।

फिल्म पूरी तरह से इस छोटी सी बच्ची के इर्द गिर्द घूमती है और ये देखना दिलचस्प है कि फिल्म के निर्देशक इन सभी परिस्थितियों में दर्शकों को बांधे रख पाते हैं या नहीं। छोटी से बच्ची मायरा व‍िश्‍कर्मा बेहतरीन है। उसकी मासूमियत फिल्म की जान है। सिर्फ डायरेक्टर ही नहीं बल्कि एक टाइम पर लगता है मानो खुद पिहू ही उस कैमरा को गाइड कर रही है उसे फॉलो करने के लिये।

बिना किसी स्टार पॉवर या आइटम सांग के भी ये फ़िल्म आपका ध्यान बांधे रखेगी। पर ये सोचना किसी भी माता पिता को डरा देगा कि एक बच्ची घर में अकेली है जिसे कुछ भी हो सकता है। सच कहा जाये तो सिर्फ माता पिता ही नहीं ये परिस्थिति किसी को भी डरा सकती है। ये फिल्म पहले से कई फ़ेस्टीवल में दिखायी जा चुकी है जहां फिल्म को काफी सराहा गया है। विनोद और मायरा दोनो ही क़ाबिल-ए-तारीफ़ हैं, इस वन कैरेक्टर फिल्म के लिये। इस तरह की यादें नाम की फिल्म सुनील दत्त ने बहुत सालों पहले की थी।

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