फक्कड़ (कहानी ) – हुबनाथ पांडेय

अचानक बड़की बखरी में फक्कड़ का आदर भाव बढ़ गया। छुटकी नानी रात को गाढ़ी मलाईदार दूध का गिलास थमाते फक्कड़ से बोली कि बेटा जरा अपनी सेहत का खियाल रखते जाओ। इतनी भी मेहनत ठीक नहीं। नानी के इस रूप से फक्कड़ न चौंका न संदेह ही किया। जन्म से ही मतिमंद फक्कड़ मासूमियत और भोलेपन की सीमा पार खड़ा था। आमतौर पर पूरा गांव उसे पगलेट समझता था और अपनी सुविधा से उसका जायज़ नाजायज़ लाभ उठाता। फक्कड़ के पिता इस गांव में नवासा पर आए थे, पर नवासा उन्हें सहा नहीं और बड़की पोखरी में नहाते पैर फिसला और हथियाडुबान पोखर में डूब गए। फक्कड़ की मां को बिस्वास तो नहीं हुआ पर लोग झूठ तो नहीं बोल रहे होंगे। फक्कड़ की मां शिवमूरत तिवारी की एकमात्र संतान थी। शिवमूरत के चचेरे भाई राममूरत और रामसूरत। राममूरत तिवारी का बड़के भइया पर अजस्र स्नेह। राम-भरत की जोड़ी थी, किन्तु जब शिवमूरत ने अपनी बीस बिगहा उपजाऊ खेती बिन मां की इकलौती बेटी गायत्री के नाम कर दी, तब से राम और भरत का रूपांतरण बाली और सुग्रीव में हो गया, पर पता किसी को न चला। सालभर के भीतर कचहरी से लौटते हुए शिवमूरत किसी जीप की चपेट में आ गए और दो तीन दिन में उनके प्राण पखेरू उड़ गए। जीप का ड्राइवर शराब पिए हुए था। राममूरत तिवारी ने जमीन-आसमान एक करके ड्राइवर को जेल पहुंचवाया और दुख की घड़ी में चट्टान की तरह गायत्री बिटिया के साथ खड़े रहे।

फक्कड़ पांच साल का था, जब पिता का साया सिर से उठा। चचेरी सही पर गायत्री राममूरत तिवारी की भतीजी ही तो थी। उसकी खेती की पूरी जिम्मेदारी राममूरत और उनके चार जवान बेटों ने उठा ली। चाची को अब कोई फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं। चारों भाई गायत्री बहन का मुंह जोहते रहते। चाचियां गदोरी पर लिए फिरतीं। इतना सुख तो पति के जीते-जी भी नहीं मिला। पर भावी को तो कुछ और ही मंजूर था। पता नहीं क्या हुआ गायत्री दिनों-दिन पीली पड़ती गई। बैद जी बोले बनारस ले जाओ। वहां बीएचयू में भी महीनों रहीं पर कोई असर नहीं। आख़िरकार अपने ही आंगन में फक्कड़ की गोद में आखिरी सांस ली। गायत्री को पूरा भरोसा था कि चचेरे ही सही पर फक्कड़ के नाना -नानी और चारों मामा ज़रूर उसका ख्याल रखेंगे। अपने गहने दोनों चाचियों में बराबर बांट दिए। बस एक जोड़ी जड़ाऊ कंगन बड़की चाची को यह कहकर दिया कि फक्कड़ की बहू को ब्याह के बाद मेरी ओर से दे देना। बड़ी चाची बनारस में रहतीं थीं और बड़के चाचा रामसूरत तिवारी यू पी कालेज में प्रोफेसर थे और भोजूबीर में अपना मकान बनवाकर वहीं रहते थे। बीच-बीच में कभी अनाज, कभी आलू मटर, साग सब्जी के लिए आते रहते । नौकरी के साथ खेती बारी पर भी पैनी नजर रहती प्रोफेसर रामसूरत तिवारी की।

शिवमूरत के बीस बीघे और राममूरत और रामसूरत के मिलाकर बीस बीघे माने चालीस पक्के बीघे का काश्तकार तिवारी कुटुंब दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा और नाजों में पले फक्कड़ की हैसियत मजूर से भी बदतर हो गई। कंगन न पाने की कसर छोटकी नानी यानी राममूरत नाना की धर्मपत्नी फक्कड़ पर निकालने लगीं। आख़िर घर की मालकिन तो वे ही थीं। खेती भी उनके बेटों और पति के ही कांधे तो थी। बड़कऊ तो लरिका परानी लिए बनारस में मौज कर रहे हैं। हालांकि पूरी आमदनी और खर्च का हिसाब किताब बड़कऊ ही रखते थे। तो कुल मिलाकर बीस बीघे का मालिक फक्कड़ दो कौड़ी का मजूर हुआ तब धीरे धीरे बात खुलने लगी कि फक्कड़ को अनाथ करने में हो न हो उसके दोनों नाना का ही हाथ न रहा हो! पटीदार लोग फक्कड़ को समझाने की पूरी कोशिश करते पर उसे अपनी मां के कहे पर भरोसा था कि नाना लोगन का साथ कभी न छोड़ना।

फक्कड़

फक्कड़ की उम्र पच्चीस की हो गई पर नाना लोगों ने शादी के बारे में सांस तक नहीं ली। पगलेट फक्कड़ इतना भी गया गुजरा नहीं था कि उसकी शादी न हो पाती। बीस बीघे ज़मीन की वजह से तो कोई भी अपनी बेटी इसके गले मढ़ने राज़ी था पर नानाओं की नज़र ज़मीन पर थी सो कैसे शादी हो जाने देते। खेत सीधे सीधे भी हड़पना मुश्किल था क्योंकि पूरे गांव की सहानुभूति फक्कड़ के साथ थी।

इतने में एक दिन पता चला कि प्रोफेसर साहब की दोनों किडनी फेल हो गई। इधर कई बरसों से ब्लड प्रेशर कंट्रोल में ही नहीं आ रहा था। बार बार लग रहा था कि छोटा भाई कहीं फक्कड़वा की सारी जमीन अपने नाम न करवा ले और इसी चिंता में किडनी बोल गई। सारे गांव में चिंता की लहर फैल गई। अधिकांश लोग मन ही मन ईश्वर के न्याय पर प्रसन्न भी थे पर ऊपर ऊपर पूरी सहानुभूति प्रोफेसर साहब के साथ। उन्हीं की वजह से गांव का नाम था। दुसरे, पंपिंग सेट उनका, ट्रेक्टर उनका, फोन , टीवी , गाड़ी सब उन्हीं के घर थी और हारे गाढ़े सभी के काम आती। सेंत नहीं। पैसा तो लेते पर समय पर काम आते यही क्या कम था?

बीएचयू के नेफ्रोलाजिस्ट ने कह दिया कि बंबई जाकर किडनी ट्रांसप्लांट करवाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। तिवारी कुटुंब में कोई भी अपनी किडनी देने को तैयार न था, ऐसे में छोटकी ने बड़की के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर उसे जडा़ऊ कंगन मिले तो वह फक्कड़वा को किडनी देने के लिए तैयार करवा सकती है और यह जड़ाऊ कंगन का ही परताप था कि गाढ़ी मलाईदार दूध फक्कड़ को थमाते हुए छोटकी नानी की आंखें भर आईं। ये ख़ुशी के आंसूं थे। दो दिन बाद ही फक्कड़ को उल्टी जुलाब शुरू हुआ और पानी चढ़वाने की नौबत आ पहुंची। डाक्टर भटनागर के नर्सिंग होम में एसी वाले रूम में फक्कड़ को एडमिट कराया गया और उसके ढेर सारे टेस्ट हुए। एसी रूम में टीवी पर भोजपुरी सिनेमा देखते हुए फक्कड़ सोच रहा था कि मां सच ही कहती थीं। खून ही खून को संभालता है। उसे अपने नानाओं पर गर्व हो आया। हफ्ते भर में फक्कड़ जब तक गांव लौटा तब तक गांव भर में खबर फैल गई कि फक्कड़ को अपेंडिक्स की बीमारी है और आपरेशन करवाना बहुतय जरूरी है। राममूरत तिवारी ने गांव के बजार में चाय पीकर कुल्हड़ पत्थर पर पटक कर फोड़ते ऐलानिया घोषित किया कि चचेरी ही सही पर गइतिरिया के बेटे की सेहत के लिए वे कोई रिस्क नहीं ले सकते। फक्कड़ का आपरेशन बंबई के सबसे बड़े अस्पताल में होगा। कुछ परसंतापी लोगों को इस सदाशयता में भी काला नजर आया पर लोगों का क्या !

आजकल फक्कड़ कोई काम नहीं करता। डाक्टर ने आराम करने और बढ़िया खाने-पीने को कहा है। पूरा घर उसकी अगवानी में आंखें बिछाए रहता है और आखिर एक दिन बाबतपुर हवाई अड्डे से राममूरत, रामसूरत, फक्कड़ और प्रोफेसर साहब के इंजीनियर बेटे बंबई को उड़े। फक्कड़ की यह पहली और आखिरी हवाई यात्रा थी।

करीब तीन महीने बाद राममूरत नाना के साथ जब फक्कड़ एसी टू टायर से महानगरी एक्सप्रेस से उतरा तब तक अपने नानाओं के अहसान के बोझ तले दब चुका था। पगलेट फक्कड़ ने पहला समझदारी भरा फैसला किया कि अपने नानाओं के अहसान और अस्पताल का खर्च चुकाने के लिए बीसो बिगहा खेत दोनों नानाओं के नाम कर दिया। अब तो उसका अपेंडिक्स का आपरेशन भी हो गया है इसलिए वह फिर से फक्कड़वा की पुरानी भूमिका में आ गया। सारी खेती की जिम्मेदारी उठा ली । उधर प्रोफेसर साहब ने किडनी ट्रांसप्लांट तो करवा लिया किन्तु पोस्ट आपरैशनल हाइजिन में असफल होकर इंफेक्शन लगवा बैठे और बीएचयू के डाक्टरों के अथक परिश्रम के बावजूद बच नहीं पाए। बड़े भाई की आकस्मिक मौत की खुशी न संभाल पाने के कारण राममूरत नाना को हल्का सा ब्रेन हैमरेज का स्ट्रोक आया और दाहिना अंग बेकार हो गया।

जड़ाऊ कंगन पहिने छोटकी नानी उनकी हगनी-मुतनी करती और चारों बेटों ने सारी खेती पर कब्जा करके कुछ तो अधिया दे दिया और थोड़ा बेचकर चार पल्सर मोटरसाइकिल एक साथ ख़रीदीं जबर डिस्काउंट के साथ। इंजीनियर बेटे ने बड़की को भी गांव भेज दिया, क्योंकि उसकी अध्यापिका पत्नी से मां की पट नहीं रही थी।

बचा सिर्फ एक फक्कड़ तो उसने दोनों बुढ़ियों और अपंग नाना की जिम्मेदारी अपने मजबूत कंधों पर उठा ली क्योंकि वह बचपन से ही जरा हल्लुक था और मरती हुई मां की इच्छा भला कैसे टाल सकता था?