शिक्षा बनाम बचपन (बाल-दिवस पर विशेष)

बचपन

डॉ. जितेन्द्र पाण्डेय | NavprabhatTimes.com

वर्तमान व्यवस्था में बचपन के कई रंग हमारे आस-पास मौजूद हैं। कहीं बस्ते के बोझ से दबा बचपन, तो कहीं ईंट के भार से कराहती मासूमियत। कहीं गजेट्स में मशगूल किशोर, तो कहीं दो जून की जुगाड़ में भटकता निर्दोष शैशव। यदि गहराई से देखा जाय, तो दोनों ही रूप डरावने हैं। एक में अभाव, बेबसी और लाचारी है, तो दूसरे में अंतहीन महत्त्वाकांक्षा; किंतु इन दोनों में जो समान है, वह है- संवेदनहीनता। सूखती संवेदना के कारण बच्चों में हिंसा, क्रोध, नशा, अपराध आदि बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो शिक्षा और नैतिकता के बीच फासला बढ़ रहा है।

‘बचपन बचाओ’ आंदोलन-

कैलाश सत्यार्थी जैसे समाज सुधारक ‘बचपन बचाओ‘ आंदोलन के माध्यम से बाल-मजदूरी और बाल-अपराध के खिलाफ मुहिम छेड़े हैं। सामाजिक संगठन गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए आगे आ रहे हैं। ये गतिविधियां किसी भी विकासशील समाज के लिए शुभ हैं, लेकिन यदि गहराई से विचार करें तो हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को ही कटघरे में खड़ा पाते हैं। ऐसी शिक्षा व्यवस्था जहां अंकों को महत्त्व दिया जाता है, स्किल को नहीं, नैतिकता को नहीं। जहाँ अध्यापक एक विक्रेता है और विद्यार्थी एक ग्राहक। यहाँ नाता गुरु और शिष्य का नहीं, बल्कि बनियागिरी का है। परिणाम भी हमारे सामने हैं। गुरुग्राम जैसी रूह कंपा देने वाली घटना से पूरा देश दहल जाता है। गहन जांच-पड़ताल के बाद असलियत हमारे सामने आती है। एक विक्षिप्त छात्र अपने ही विद्यालय-परिवार के मासूम को मौत के घाट उतार देता है। शिक्षा-मंदिर की विडंबना देखिए, या यूं कहें कॉर्पोरेट-मंदिर की। दोष, एक गरीब कंडक्टर के माथे मढ़ दिया जाता है। पूरे देश के शिक्षण संस्थानों में एक्सपर्ट बुलाए जाते हैं। चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के प्रति बच्चों में अविश्वास भरा जाता है। मज़ेदार यह जानना होगा कि मामला प्रकाश में आने के बाद शिक्षा जगत क्या करेगा ? छात्रों में पनपती हिंसा और क्रोध को शांत करने के लिए कौन सा सेमिनार और वर्कशॉप करेगा ? अब भी विद्यार्थियों का मूल्यांकन उनके अंकों के आधार पर किया जाएगा या कोई दूसरा पैमाना सुनिश्चित होगा ?

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उस देश की कक्षाओं में पलता है। ज्ञान और सूचनाएं मानव-मन को स्वतंत्र करती हैं। यदि ये बंधनकारक बन गईं, तो बचपन खोने लगता है। भौतिक सुख और उपलब्धियां आकर्षण के केंद्र में आ जाती हैं। फलस्वरूप अभिभावक बच्चों पर दबाव बनाते हैं। बचपन छिनने लगता है। खिलखिलाहट गायब हो जाती है। पुस्तकों का भार असह्य होने लगता है।

हमारा यह कर्तव्य है कि देश के नौनिहालों का बचपन बरकरार रखें। ये अपने जीवन को खुल कर जिएं। नैतिकता और विवेक से हम इन्हें लैस करें। अनावश्यक दबाव बनाने से बचें। यह समझाने की कोशिश करें कि सफलता बेशुमार धन-दौलत कमाने में नहीं, बल्कि नेक इंसान बनने में है। शिक्षा का असली उद्देश्य भी यही है। बचपन और शिक्षा एक दूसरे के पूरक बनें, विरोधी नहीं।

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