संभवामियुगेयुगे ( कविता ) – हूबनाथ पाण्डेय

त्राहि माम करुणानिधान
धरित्री विकल है
विह्वल है सृष्टि सारी
कीड़े-मकोड़ों की भांति
मर रहे हैं लोग
न ज्ञानी कुछ कर पा रहे
न विज्ञानी ही
सब खोए हुए हैं
क़िस्सो- कहानियों में
जीवों के आधार
परम शक्ति परमात्मन
सबकी विषाद दृष्टि
टिकी है सिर्फ़ आप पर
हे शेषशायी दया के सागर
आपके मंदिरों के कपाट
तक बंद हैं
भक्तगण घंटा बजाकर
थक चुके हैं
आपकी क्रेडिबिलिटी का
प्रश्न है प्रभो!
साधु! नारद !साधु!!
मैं इसके पूर्व भी आपके
डाउन टू अर्थ अप्रोच की
प्रशंसा कर ही चुका हूं
आपकी चिंता जायज़ है
ऋषिवर
किंतु आपका बेसिक
कंसेप्ट क्लीअर नहीं
इसीलिए आप व्यर्थ व्यग्र
व्यथित उत्तेजित हो रहे हो
मैं प्रत्येक युग मे
अनिवार्यतः
अवतरित होता हूं
विशिष्ट रूपाकार में
मेरे दशावतार की कथा
विश्वविख्यात है
किंतु साधारण जीवों को
ज्ञात नहीं कि
मैं रूप भी हूं
और अरूप भी
वस्तु में भी हूं
और विचार में भी
इक्कीसवीं सदी में मेरा
अवतार है राजनीति
इस युग में राजनीति ही
ब्रह्म है, ज्ञान है , भक्ति है
इसी में सबसे बड़ी शक्ति है
बाक़ी सब शक्तिहीन व्यर्थ
जिन्हें यह रहस्य ज्ञात है
उन योगियों को सहज ही
सत्ता शक्ति भक्ति प्राप्त है
देवर्षि !
मैं अब भी कण कण में हूं
मैं ही कोरोना हूं
वैक्सीन भी मैं ही हूं
और वह व्यापारी भी
जो कमाएगा अरबों-खरबों
और अंततः दान करेगा
मेरे ही मंदिरों को
तुमने साधुओं की हत्या पर
जो दुख प्रकट किया
वह भी उचित ही है
किंतु वे साधु
मेरे भक्त नहीं थे
जिस भक्ति में
राजनीति शामिल न हो
वह मेरी भक्ति नहीं
जिस व्यवसाय में
राजनीति शामिल न हो
वह शुद्ध व्यवसाय नहीं
जिस रिश्ते में राजनीति
शामिल न हो वह बोझ है
जिस धर्म में
राजनीति शामिल न हो
वह अधर्म है
राजनीति दुष्कर्मों को
वैसे ही पवित्र कर देती है
जैसे ग्रहण काल के जल
को तुलसी दल
इसलिए साधु वह है
जिसका
औसत टर्न ओवर
सौ करोड़ से ऊपर हो
जो राजनीति का ज्ञाता हो
क्योंकि
राजनीति ही ब्रह्म है
कण कण में व्याप्त है
धर्म राजनीति सत्ता तीनों
जो साध ले भलीभांति
वह मेरा सबसे बड़ा भक्त
उसके प्रताप का सूर्य
कभी अस्त नहीं होगा
उसके सिवा
कोई मस्त नहीं होगा
मस्ती सिर्फ़ तसव्वुफ़ में नहीं
राजनीति में भी भरपूर है
तुम ठहरे सीधे-सादे भक्त
तुच्छ जीवों के दुख से
कष्ट से व्यथित हो जाते हो
और भूल जाते हो कि उसी
धरती पर मेरे अर्चनार्थ
करोड़ों फूल पत्तियां रोज़
अकाल मार डाली जाती हैं
वे इसे व्यापार कहते हैं
वैसे ही कुछ लाख
फूल पत्तियों सदृश
नगण्य जन
विभिन्न व्याधियों से मर
जाते हैं तो यह भी एक
व्यापार ही तो है
जीवन व्यापार
हे भक्तश्रेष्ठ!
गीता के मेरे संदेश का
स्मरण करो
आत्मा जीर्ण वस्त्रों को
त्याग कर
नए वस्त्र धारण करती है
और ये वस्त्र तो वैसे ही
दुर्गंधयुक्त थे
कोई लाख रुपए के
रेशमी सूट तो नहीं थे
एक और सूत्र ग्रहण करो
आत्मा का महत्व
उसके सत्कर्मों से नहीं
उसके वस्त्रों से
स्थापित होता है
अब तुम्हीं बताओ
किसी रेशमवस्त्रधारी
आत्मा को कोई कष्ट हुआ
रेशम का राजनीति से
गहरा रिश्ता रहा है
अतः हे ब्रह्मासुत!
धर्म,दर्शन, भक्ति, साधना
सबका त्याग करो और
राजनीति में लौ लगाओ
क्योंकि इस युग में मेरा
अस्तित्व भी निर्भर है
सिर्फ़ राजनीति पर
मनुष्य
कितना भी लंपट क्रूर
धूर्त, पापी, भ्रष्ट हो
राजनीति
उसे पूज्य बना देती है
आदरणीय कर देती है
सत्य वही है
जो सत्ता की राजनीति के
श्रीमुख से नि:सृत होता है
अब सत्य हेतु वन वन
भटकने की आवश्यकता
बिल्कुल नहीं
सत्ताधारी राजनीति में
प्रवेश करना ही काफ़ी है
किंतु यह इतना सहज
अब नहीं रहा
आप भी इस दिशा में
विचार करें और
मोक्ष प्राप्त करें
मेरी शयन आरती का
वक़्त हो चला है
सुखी भव

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