विदूषक ( कविता ) – हूबनाथ पाण्डेय

विदूषक
प्रतीकात्मक चित्र

सने अभिनय किया भूख का
तमाशाइयों की ऐंठ गईं
अँतड़ियाँ भीतर तक
बच्चे बिलबिलाकर
मर गए

उसने अभिनय किया
शौर्य का
नौजवान लाशें
ताबूतों में भर भर
रवाना हुईं

वह खेतों में गया
किसान श्मशान में
फ़सलें डूबकर मर गईं
सूखी फटी दरारों में

उसने जैसे ही कहा
सत्यमेव जयते
सत्य के वस्त्र गल गलकर
गिर पड़े ज़मीन पर

कैसा चमत्कार है
नक़्शे को जोड़ने के लिए
पहले उसके चीथड़े करता
फिर बटोरता है

बावजूद
बेहतरीन अभिनय के
उसकी वहशत
दहशत बनकर छा जाती है

विदूषक
हँसाने के लिए आया था
लोग मर रहे हैं
हँसते हँसते. 

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